हेलो दोस्तों आप सब कैसे हैं? मैं अवनीश आज आपके लिए एक नई मूवी लेकर आया हूँ। दोस्तों, ये मूवी सिर्फ एंटरटेनमेंट ही नहीं बल्कि हमें सोचने पर भी मजबूर करती है। इसमें आपको ड्रामा, इमोशन और मस्ती तीनों का जबरदस्त कॉम्बिनेशन देखने को मिलेगा।
जॉली एलएलबी 3, 19 सितंबर को सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है और दर्शकों के बीच इसे लेकर जबरदस्त उत्साह देखने को मिल रहा है। इस बार भी कहानी कोर्टरूम से जुड़ी है, लेकिन इसमें समाज के सबसे अहम मुद्दे — किसानों की समस्याओं — को बड़ी ही गंभीरता और संवेदनशीलता के साथ दिखाया गया है।
फिल्म में अक्षय कुमार और अरशद वारसी दोनों ही अपने-अपने जॉली अवतार में नज़र आते हैं। दर्शकों को यह देखना दिलचस्प लगता है कि दो जॉली आमने-सामने कोर्ट में कैसे भिड़ते हैं। एक तरफ तेज-तर्रार दलीलें और दूसरी तरफ मज़ाकिया अंदाज़, फिल्म को मनोरंजन के साथ-साथ सोचने पर मजबूर करने वाला बना देता है।
निर्देशक सुभाष कपूर ने फिल्म की कहानी को इस तरह पिरोया है कि कोर्टरूम ड्रामा के बीच भावनाओं का ताना-बाना भी मज़बूत रहे। किसानों की पीड़ा, उनकी संघर्ष भरी ज़िंदगी और न्याय की लड़ाई को बड़े पर्दे पर बेहद असरदार तरीके से उतारा गया है।
कॉमेडी, इमोशन और सस्पेंस का बेहतरीन मिश्रण जॉली एलएलबी 3 को एक संपूर्ण पैकेज बनाता है। खासतौर पर फिल्म का दूसरा हिस्सा दर्शकों को सीट से बांधे रखता है।
कुल मिलाकर, यह फिल्म उन लोगों के लिए है जो मनोरंजन के साथ-साथ समाज से जुड़ा संदेश भी पाना चाहते हैं। जॉली एलएलबी 3 आपको हंसाएगी, रुलाएगी और सोचने पर मजबूर करेगी।
जॉली एलएलबी 3: जब दो जॉली आमने-सामने हुए – हंसी के बीच एक गंभीर सवाल
एक बार फिर कोर्टरूम की दुनिया में हाजिर है एक कहानी, जो ना केवल गुदगुदाती है, बल्कि सोचने पर भी मजबूर करती है। इस बार मामला और भी दिलचस्प है, क्योंकि दो वकील आमने-सामने हैं – और दोनों हैं ‘जॉली’।
मुद्दा है किसानों की ज़मीन का
इस बार कहानी का फोकस एक गंभीर सामाजिक समस्या पर है – किसानों की ज़मीन से जुड़ा विवाद। फिल्म यह दिखाती है कि कैसे सिस्टम की खामियों और लालच की ताकत के बीच आम आदमी की आवाज़ दब जाती है। मगर इस गंभीर विषय को हल्के-फुल्के अंदाज़ में, ह्यूमर और भावना के संतुलन के साथ दिखाया गया है।
दो जॉली, दो सोच
कहानी की जान है दोनों वकीलों की टक्कर। एक ओर हैं तेज-तर्रार और चालाक वकील, और दूसरी तरफ हैं ज़मीन से जुड़ा, ईमानदार जॉली। दोनों की कोर्ट में बहस, तर्क और संवाद दर्शकों को बांधकर रखते हैं। यह सिर्फ एक केस की लड़ाई नहीं, बल्कि दो सोचों की लड़ाई है।
जज की भूमिका में दमदार प्रदर्शन
न्यायाधीश की भूमिका एक बार फिर पूरी गरिमा और हास्य के साथ निभाई गई है। उनके संवाद, निर्णय और हावभाव कहानी को गहराई देने के साथ-साथ हल्कापन भी बनाए रखते हैं।
कुछ कमियां भी हैं
जहां एक ओर फिल्म मनोरंजन और संदेश में संतुलन बनाने की कोशिश करती है, वहीं कुछ जगहों पर इसकी गति थोड़ी धीमी महसूस होती है। कोर्टरूम दृश्यों में पहले जैसी तीव्रता नहीं है, लेकिन विषय की गंभीरता इसकी भरपाई कर देती है।
अंतिम राय
फिल्म देखने लायक है। इसमें सामाजिक मुद्दा है, मनोरंजन है, भावनाएं हैं और कलाकारों के शानदार प्रदर्शन का मेल है। यह सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि आज के दौर की एक ज़रूरी कहानी है – जो हंसाते हुए भी बहुत कुछ कह जाती है।