अमेरिका के प्रतिबंधों से रूस बेअसर रहा
रूस-यूक्रेन संघर्ष के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर भारी आर्थिक और राजनीतिक प्रतिबंध लगाए। इन प्रतिबंधों का उद्देश्य था रूस की अर्थव्यवस्था को कमजोर करना और उसकी वैश्विक स्थिति को प्रभावित करना। लेकिन इन प्रयासों के बावजूद रूस ने खुद को स्थिर बनाए रखा और अपने रणनीतिक साझेदारों, विशेषकर भारत, के साथ रिश्तों को और मजबूत किया।
क्या थे अमेरिका के प्रतिबंध?
- रूस के बैंकों और कंपनियों पर व्यापारिक रोक।
- तकनीकी सहयोग और निवेश पर प्रतिबंध।
- ऊर्जा क्षेत्र (तेल और गैस) में रूस को वैश्विक बाजार से अलग करने की कोशिश।
- सैन्य उपकरणों और रक्षा समझौतों पर अप्रत्यक्ष दबाव।
रूस पर प्रभाव कितना हुआ?
- ऊर्जा व्यापार में निरंतरता
रूस ने अपने तेल और गैस निर्यात को नए बाजारों की ओर मोड़ा, जिसमें भारत प्रमुख था। भारत ने किफायती दरों पर रूस से तेल आयात जारी रखा, जिससे दोनों देशों को लाभ हुआ। - रक्षा सहयोग पर कोई असर नहीं
भारत-रूस के बीच चल रहे रक्षा सौदे, जैसे कि S-400 मिसाइल प्रणाली, बिना किसी रुकावट के जारी रहे। दोनों देशों ने स्पष्ट कर दिया कि यह सहयोग बाहरी दबावों से प्रभावित नहीं होगा। - नई वैश्विक धुरी का निर्माण
रूस ने ऐसे देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी को बढ़ावा दिया जो स्वतंत्र विदेश नीति अपनाते हैं। इससे पश्चिमी देशों के प्रभाव को सीमित किया गया। - अर्थव्यवस्था में लचीलापन
रूस की अर्थव्यवस्था पर कुछ दबाव जरूर आया, लेकिन यह गंभीर स्तर तक नहीं पहुँचा। देश ने आंतरिक संसाधनों और वैकल्पिक व्यापार मार्गों से खुद को संभाला।
भारत का संतुलित दृष्टिकोण
भारत ने हमेशा अपनी विदेश नीति को “रणनीतिक स्वायत्तता” के आधार पर तय किया है। पश्चिमी दबावों के बावजूद भारत ने रूस के साथ अपने रिश्तों को प्राथमिकता दी:
- ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूस से निरंतर तेल आयात।
- रक्षा सहयोग को बनाए रखना।
- वैश्विक मंचों पर रूस के साथ संवाद और समर्थन।
भारत ने यह साफ कर दिया कि वह किसी एक पक्ष की राजनीति में विश्वास नहीं करता, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखता है।
निष्कर्ष
अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद रूस ने अपनी स्थिति को न केवल संभाला बल्कि कुछ मामलों में और भी मजबूत किया। भारत जैसे देशों के साथ उसके रिश्तों ने यह स्पष्ट किया कि वैश्विक राजनीति अब एकध्रुवीय नहीं रही। भारत-रूस साझेदारी आने वाले वर्षों में और भी गहरी होने की संभावना है — जो यह दर्शाता है कि रणनीतिक संबंध तात्कालिक दबावों से नहीं, दीर्घकालिक समझ और हितों से संचालित होते हैं।
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